कवर्धा

स्वदेशी मेला या सीधी लूट? स्टॉल किराया आसमान पर, बाजार से तीन गुना दाम, बाहरियों का कब्जा!

स्वदेशी मेला या सीधी लूट? स्टॉल किराया आसमान पर, बाजार से तीन गुना दाम, बाहरियों का कब्जा!

 

कवर्धा। जिले में इन दिनों चल रहे तथाकथित “स्वदेशी मेले” को लेकर लोगों में गहरा आक्रोश पनपने लगा है। जिस आयोजन को स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और आम जनता को सस्ते व बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रचारित किया गया था, वही मेला अब लोगों की जेब ढीली करने का जरिया बनता नजर आ रहा है। मेले में पहुंच रहे नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, जबकि स्थानीय व्यापारियों में भी असंतोष साफ दिखाई दे रहा है।

 

स्टॉल किराया ही बना ‘लूट’ की जड़

 

सूत्रों के अनुसार मेले में स्टॉल लगाने के लिए दुकानदारों से ₹20,000 से ₹25,000 तक किराया वसूला गया है। छोटे व्यापारियों का कहना है कि जब शुरुआत ही इतने भारी खर्च से हो रही है तो वे सस्ते दाम पर सामान बेचने की स्थिति में कैसे रहेंगे। कई दुकानदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मजबूरी में उन्हें बाजार से अधिक कीमत पर सामान बेचना पड़ रहा है ताकि स्टॉल किराया, बिजली, परिवहन और अन्य खर्चों की भरपाई हो सके।

 

बाजार से दोगुने-तीन गुने दाम

 

मेले में बिक रहे सामानों के दाम सुनकर आम लोग हैरान हैं। जो वस्तुएं स्थानीय बाजार में ₹10 में उपलब्ध हैं, वही मेले में ₹25 से ₹30 तक बेची जा रही हैं। फूड आइटम से लेकर साड़ी, चूड़ी, खिलौने और फैंसी सामान तक—हर जगह महंगाई का असर साफ दिखाई देता है। यहां तक कि बच्चों के झूले और अन्य मनोरंजन साधनों की दरें भी इतनी अधिक हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार दो बार सोचने को मजबूर हो रहे हैं।

मेले में घूमने आए एक परिवार ने नाराजगी जताते हुए कहा कि “स्वदेशी” के नाम पर आकर्षित कर यहां जेब काटी जा रही है। उनका कहना था कि यदि दाम बाजार से अधिक ही देने हैं तो फिर मेले में आने का औचित्य क्या रह जाता है।

 

स्थानीयों को किनारे, बाहरियों का दबदबा

 

सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब इसे “स्वदेशी” मेला बताया जा रहा है, तो स्थानीय व्यापारियों की भागीदारी इतनी कम क्यों है। जानकारी के अनुसार मेले में अधिकतर स्टॉल उत्तरप्रदेश और बिहार से आए व्यापारियों के हैं, जबकि जिले और आसपास के स्थानीय व्यापारी गिनती के ही नजर आ रहे हैं। स्थानीय दुकानदारों का आरोप है कि उन्हें या तो जानकारी समय पर नहीं दी गई या फिर किराया इतना अधिक रखा गया कि वे भाग लेने से पीछे हट गए।

 

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि स्वदेशी मेले में स्थानीयों को ही प्राथमिकता नहीं दी जा रही, तो फिर “स्वदेशी” शब्द का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

 

आम जनता में बढ़ता असंतोष

 

मेले में आने वाले कई लोगों ने खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि यह आयोजन सुविधा देने के बजाय शोषण का माध्यम बनता जा रहा है। महंगे दाम, ऊंचा स्टॉल किराया और बाहर से आए व्यापारियों की भरमार ने मेले की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग इस विषय पर तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

 

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

 

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन इस पूरे मामले पर ध्यान देगा। क्या स्टॉल किराया और दामों की समीक्षा होगी या फिर यह मेला केवल नाम का “स्वदेशी” बनकर रह जाएगा और आम जनता यूं ही ठगी महसूस करती रहेगी।

 

जिलेवासियों की मांग है कि यदि मेला वास्तव में स्वदेशी और जनहितकारी है, तो इसकी पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, स्टॉल किराया कम किया जाए और स्थानीय व्यापारियों को प्राथमिकता दी जाए। वरना यह आयोजन लोगों की नजर में “स्वदेशी मेला” नहीं, बल्कि “लूट का मेला” बनकर रह जाएगा।

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